यह प्रसिद्ध हिंदी गीत "कई बार यूँ भी देखा है" है, जिसे रजनीगंधा (1974) फिल्म के लिए महान गायक मुकेश ने गाया था। इस खूबसूरत ...
यह प्रसिद्ध हिंदी गीत "कई बार यूँ भी देखा है" है, जिसे रजनीगंधा (1974) फिल्म के लिए महान गायक मुकेश ने गाया था। इस खूबसूरत गीत के गीतकार योगेश हैं और संगीत सलिल चौधरी ने दिया है।
यह गीत "कई बार यूँ भी देखा है" मानव मन (Human Mind) की चंचलता, दुविधा और उसकी अंतहीन इच्छाओं को बहुत ही खूबसूरती से दर्शाता है। गीतकार योगेश ने इसमें दिखाया है कि कैसे हमारा मन स्थापित सीमाओं को तोड़कर अनजानी राहों पर भटकने लगता है।आइए इस पूरे गीत का गहराई से और सरल शब्दों में अर्थ समझते हैं:
कई बार यूँ भी देखा है
ये जो मन की सीमा रेखा है,
मन तोड़ने लगता है
अनजानी प्यास के पीछे,
अनजानी आस के पीछे,
मन दौड़ने लगता है...
अर्थ: कवि कहते हैं कि अक्सर ऐसा होता है कि इंसान का मन अपनी तय की गई सीमाओं, मर्यादाओं या संतुष्टि के दायरे को तोड़ने की कोशिश करने लगता है। जीवन में सब कुछ ठीक होने के बावजूद, मन एक ऐसी 'अनजानी प्यास' (अतृप्ति) और 'अनजानी आस' (उम्मीद) के पीछे भागने लगता है जिसके बारे में वह खुद भी ठीक से नहीं जानता। यह इंसानी स्वभाव है कि जो हमारे पास है, हम उससे अलग कुछ और पाने के लिए बेचैन हो जाते हैं।
राहों में, राहों में, जीवन की राहों में
जो खिले हैं फूल-फूल मुस्कुरा के
कौन सा फूल चुरा के रख लूँ मन में सजा के?
ये सोच के ही मन में कभी, कोई शंका जागने लगती है
अर्थ: जीवन के सफर (राहों) में हमारे सामने कई खूबसूरत अवसर, रिश्ते या आकर्षण (जिन्हें यहाँ 'खिले हुए फूल' कहा गया है) आते हैं। मन उन सभी को देखकर ललचाता है और सोचता है कि मैं किस अवसर या खुशी को चुनकर अपने पास समेट लूँ? लेकिन अगले ही पल मन में एक डर या शंका (Doubt) पैदा हो जाती है—क्या यह सही है? क्या इसे चुनने से मैं कुछ और तो नहीं खो दूँगा? यह सही और गलत के बीच की दुविधा को दिखाता है।
जानें क्यों, जानें क्यों, बीते दिनों की यादें
धुंधली सी सुबह के ओस-कण जैसी
आँखों में झलकने लगती हैं, कुछ ऐसे बहने लगती हैं
के हर गुज़रा पल, हर बीता कल, नई शक्ल में सामने आता है
अर्थ: यहाँ मन के एक और स्वभाव को दिखाया गया है—यादों में खो जाना। बीते हुए कल की यादें सुबह की ओस की बूंदों की तरह धुंधली लेकिन खूबसूरत होती हैं। जब हम वर्तमान में असमंजस में होते हैं, तो पुरानी यादें हमारी आँखों में आँसू या मुस्कान बनकर छलक आती हैं। हमारा बीता हुआ समय एक नए रूप में हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है, जिससे मन वर्तमान को छोड़कर अतीत के ख्यालों में डूब जाता है।
यह गाना मनोवैज्ञानिक (Psychological) है। फिल्म रजनीगंधा में मुख्य किरदार (दीपा) अपने पुराने प्यार और नए साथी के बीच भावनात्मक कशमकश से गुजर रही होती है। यह गीत उसी मानसिक स्थिति को बयां करता है कि कैसे इंसान का मन कभी स्थिर नहीं रहता—वह हमेशा एक अनजाने भटकाव, पुरानी यादों और नई चाहतों के जाल में बुना रहता है।
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